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MPPSC Topper Deepika Patidar

MPPSC Topper Deepika Patidar: सहेली बनी ‘डिप्टी कलेक्टर’, खुद 6 नंबर से फेल: 5 साल के आंसुओं के बाद ऐसे रैंक-1 लाईं दीपिका

Written By: Gaurav Gautam
Last Updated: January 11, 2026 | 03:40 PM IST

एक ही कॉलेज, एक ही हॉस्टल का कमरा और सपना भी एक—अफसर बनने का। प्रीलिम्स साथ निकला, मेन्स साथ लिखा और इंटरव्यू भी एक ही दिन हुआ। सबको लगा था दोनों सहेलियाँ साथ में अफसर बनेंगी।

लेकिन जब 2018 का रिजल्ट आया, तो सहेली का सिलेक्शन हो गया (8th रैंक) और दीपिका महज 6 नंबर से बाहर हो गईं।

यह कहानी सिर्फ MPPSC रैंक-1 दीपिका पाटीदार की नहीं, बल्कि हर उस एस्पिरेंट की है जिसे लगता है कि उसकी किस्मत ही खराब है। 2018 में मिली उस हार के बाद उन्होंने कैसे खुद को संभाला और 5 साल के लंबे संघर्ष के बाद टॉप किया—यह जानना आपके लिए जरूरी है।

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“मुझे लगा था कौन लगाता है 5 साल?”

तैयारी के शुरू में दीपिका को लगता था कि “पंचवर्षीय योजना” तो वो लोग बनाते हैं जो पढ़ते नहीं। उन्हें लगा था एक-दो बार में तो निकाल ही लेंगे। दोस्तों ने फोन में उनका नंबर ‘Next DC’ (अगली डिप्टी कलेक्टर) नाम से सेव कर लिया था।

लेकिन असलियत बहुत कड़वी थी। 2018 में इंटरव्यू से बाहर हुईं। फिर 2019, 2020 और 2021… बैक-टू-बैक फेलियर्स। कोविड आया, रिजल्ट लटके और वो डिप्रेशन में जाने लगीं। खजराना गणेश मंदिर में रिजल्ट चेक किया और वहीं रो पड़ीं—सवाल एक ही था, “अब लोगों को शक्ल कैसे दिखाऊंगी?”

किताबों का ढेर नहीं, एक ‘सिनोप्सिस’ को 10 बार घोंटा

दीपिका की रैंक-1 का सीक्रेट उनकी किताबों की अलमारी में नहीं, उनके खुद के बनाए सिनोप्सिस (Short Notes) में छिपा था।

ज्यादातर छात्र नई किताबों के पीछे भागते हैं। दीपिका ने पॉडकास्ट में साफ कहा— “मुझे एक ही नोट्स को बार-बार पढ़ने में बोरियत नहीं, मज़ा आता था।” उन्होंने कोचिंग के नोट्स और स्टैंडर्ड बुक्स से अपने खुद के सिनोप्सिस बनाए और उन्हें इतनी बार पढ़ा कि एग्जाम में पेज का विज़ुअल दिमाग में छप गया।

(Quote Block): “अगर 10 किताबें एक बार पढ़ोगे तो कन्फ्यूज हो जाओगे, एक किताब 10 बार पढ़ोगे तो अफसर बन जाओगे।”

प्रीलिम्स का डर? तैयारी मेन्स की करो

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दीपिका ने लगातार 5 बार प्रीलिम्स निकाला, और उनका स्कोर हमेशा कट-ऑफ से काफी ऊपर रहा। उनकी स्ट्रेटेजी बहुत साफ थी— “प्रीलिम्स की तैयारी मत करो।”

सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन लॉजिक सीधा है। दीपिका कहती हैं, “जब आप मेन्स (Mains) को डीप में पढ़ते हैं, तो प्रीलिम्स का 80% सिलेबस अपने आप कवर हो जाता है।”

नये बच्चे आते ही लुसेंट या फैक्ट्स रटने लगते हैं, यही सबसे बड़ी गलती है। पहले मेन्स का सिलेबस खत्म करो, प्रीलिम्स एग्जाम से सिर्फ 2 महीने पहले ऑब्जेक्टिव्स पर शिफ्ट हो।

“शादी नहीं करेंगे, तू बस पढ़ ले”

लड़कियों के लिए सबसे बड़ा प्रेशर ‘शादी’ होता है। लेकिन दीपिका मानती हैं कि अगर आप अपने पेरेंट्स को विश्वास दिला दें, तो वो दुनिया से लड़ जाते हैं।

लगातार 5 साल फेल होने के बाद भी उनके मम्मी-पापा ने कहा— “बेटा तू चिंता मत कर, तेरी शादी 2 साल और नहीं करेंगे, तू बस पढ़ाई कर।” इसी सपोर्ट ने उन्हें टूटने नहीं दिया।

प्लान B: हारने वालों के लिए नहीं, समझदारों के लिए है

दीपिका ने एक बहुत बड़ी गलती मानी— उनके पास कोई ‘प्लान बी’ (Plan B) नहीं था।

शुरुआत में जोश था, लेकिन जब 4-5 साल निकल गए, तो करियर का डर सताने लगा। उन्होंने पॉडकास्ट में एस्पिरेंट्स को सलाह दी कि प्लान बी का होना आपको ‘कमजोर’ नहीं बल्कि ‘निडर’ बनाता है। अगर आपके पास बैकअप है, तो आप एग्जाम हॉल में बिना डरे पेपर देते हो।

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हमारा टेकअवे (Takeaway): दीपिका की कहानी हमें यह सिखाती है कि टॉपर वो नहीं जो पहली बार में जीत गया। टॉपर वो है जिसने अपनी बेस्ट फ्रेंड को आगे निकलते देखा, लोगों के ताने सहे, ‘Next DC’ वाले ताने को सहा, लेकिन अपनी टेबल और कुर्सी का साथ नहीं छोड़ा।

आप अपनी तैयारी में अभी कहाँ हैं? क्या आप भी उसी ‘सेल्फ-डाउट’ से जूझ रहे हैं जिससे दीपिका कभी जूझ रही थीं? कमेंट में बताएं।

About the Author

Gaurav Gautam एक MPPSC aspirant और education content writer हैं, जिन्हें MPPSC परीक्षा पैटर्न और interview प्रक्रिया का व्यावहारिक अनुभव है। वह exam analysis और preparation strategy पर लिखते हैं।

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