MPPSC success story – MPPSC की तैयारी कर रहे लाखों अभ्यर्थियों के लिए यह कहानी उम्मीद, धैर्य और जिद की मिसाल है। लगातार असफलताओं के बाद भी हार न मानने वाले बालाघाट के नए CSP मयंक तिवारी आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मयंक तिवारी ने MPPSC परीक्षा लगातार 5 बार दी, लेकिन एक बार भी प्री परीक्षा पास नहीं कर पाए। इसके बावजूद उन्होंने तैयारी नहीं छोड़ी और छठी बार में सीधे अफसर बनकर चयनित हो गए।
5 बार असफलता, फिर 6वीं बार बदली किस्मत
मयंक तिवारी ने बताया कि शुरुआती पांच प्रयासों में प्री परीक्षा तक नहीं निकल पाई। कई बार निराशा जरूर हुई, लेकिन उन्होंने खुद पर भरोसा बनाए रखा। आखिरकार वर्ष 2018 की MPPSC परीक्षा में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए पूरी परीक्षा पास की और चौथी रैंक हासिल की।
यह वही दौर था जब ज्यादातर उम्मीदवार टॉप रैंक मिलने पर प्रशासनिक सेवा को प्राथमिकता देते हैं।
डिप्टी कलेक्टर का पद छोड़ा, चुनी वर्दी
MPPSC 2018 में चौथी रैंक मिलने के बाद मयंक तिवारी के पास डिप्टी कलेक्टर बनने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने यह पद स्वीकार नहीं किया।
उनका कहना है कि बचपन से ही उनका झुकाव यूनिफॉर्म और पुलिस सेवा की ओर था। इसी कारण उन्होंने अफसरशाही की कुर्सी छोड़कर DSP पद को चुना और वर्दी पहनकर सेवा का रास्ता अपनाया।
बालाघाट में तीसरी पोस्टिंग, काम से बनाई पहचान
हाल ही में बालाघाट CSP वैशाली सिंह कराहलिया के भोपाल ट्रांसफर के बाद मयंक तिवारी ने CSP का पद संभाला है। बालाघाट में यह उनकी तीसरी पोस्टिंग है।
इससे पहले वे शहडोल और शाहपुर में पदस्थ रहे, जहां उनके काम की चर्चा पूरे मध्यप्रदेश में हुई। एक जघन्य मर्डर केस, जिसमें शव पूरी तरह जल चुका था, उसकी गुत्थी उन्होंने तीन महीने में सुलझाई, जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।
MPPSC अभ्यर्थियों के लिए क्या सीख?
मयंक तिवारी की कहानी उन उम्मीदवारों के लिए खास है जो बार-बार असफलता के बाद खुद को कमजोर समझने लगते हैं। यह साबित करता है कि:
- बार-बार फेल होना अंत नहीं है
- एक प्रयास नहीं, लगातार प्रयास मायने रखता है
- रैंक से ज्यादा जरूरी है खुद का सपना
असफलता से सफलता तक का सफर
5 बार प्री न निकलना और 6वीं बार सीधे अफसर बन जाना यह दिखाता है कि MPPSC जैसी परीक्षा में धैर्य, आत्मविश्वास और निरंतर मेहनत ही सबसे बड़ा हथियार है।
यह कहानी सिर्फ एक अफसर की नहीं, बल्कि हर उस अभ्यर्थी की है जो आज भी अपनी तैयारी के बीच हार मानने की सोच रहा है।
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