इंदौर की बस में रोज़ एक घंटा सफर करते हुए पढ़ाई करना, मोबाइल फोन की लत, महंगी कोचिंग अफोर्ड न कर पाना और समाज का लगातार शक—ये चुनौतियां किसी एक उम्मीदवार की नहीं हैं। यही आज के MPPSC aspirants की सामूहिक सच्चाई है।
मोना दांगी की कहानी इसलिए अलग है, क्योंकि उन्होंने इन चुनौतियों को बहाना नहीं बनाया, बल्कि इन्हीं कमियों को अपनी ताकत में बदला।
गांव से शुरू हुआ सफर
मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले के एक गांव से आने वाली मोना दांगी उस पृष्ठभूमि से थीं, जहां लड़कियों का बाहर जाकर पढ़ना आज भी असामान्य माना जाता है। परिवार ने सामाजिक दबाव का सामना करते हुए एक रास्ता निकाला—पूरे परिवार के साथ इंदौर शिफ्ट होना, ताकि पढ़ाई संभव हो सके।
संसाधन सीमित थे। बड़े कोचिंग संस्थानों की ₹2–5 लाख की फीस उनके लिए संभव नहीं थी। उस समय मोना को लगता था कि शायद उनके साथ अन्याय हो रहा है—जब सबके पास संसाधन हैं और उनके पास नहीं, तो चयन कैसे होगा?
बाद में यही सोच बदलनी थी।
सबसे बड़ी कमजोरी: मोबाइल और ध्यान भटकाव
मोना खुद मानती हैं कि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी मोबाइल फोन था। दिन के 8–10 घंटे स्क्रीन पर निकल जाते थे। अधिकांश उम्मीदवार इसे अपनी असफलता का कारण मानकर खुद को कोसते रहते हैं, लेकिन मोना ने अलग रास्ता चुना।
उन्होंने मोबाइल को छोड़ा नहीं, बल्कि उसे पढ़ाई का माध्यम बना लिया।
YouTube से लेक्चर, MCQ वीडियो, क्विज़ ऐप्स और रिवीजन कंटेंट—मोबाइल वही रहा, लेकिन इस्तेमाल बदल गया।
यही पहला बड़ा मोड़ था:
कमजोरी को खत्म करने की बजाय, उसे दिशा देना।
नेगेटिविटी को एनर्जी में बदला
MPPSC की तैयारी के दौरान नेगेटिविटी, आत्म-संदेह और भविष्य का डर लगभग हर उम्मीदवार झेलता है। मोना भी इससे अलग नहीं थीं। कई बार लगता था—“मुझसे नहीं होगा।”
लेकिन उन्होंने इस मानसिक दबाव को पढ़ाई से भागने का कारण नहीं बनाया। जब चिंता बढ़ती, तब वे खुद से पूछतीं—
“इस समय मैं क्या कर सकती हूं?”
उत्तर एक ही होता—पढ़ाई।
उनके लिए पढ़ना बोझ नहीं, बल्कि नेगेटिव एनर्जी को बाहर निकालने का तरीका बन गया।
बिना कोचिंग भी चयन संभव है
मोना की कहानी इस भ्रम को भी तोड़ती है कि बिना कोचिंग MPPSC निकल ही नहीं सकता। उन्होंने साफ स्वीकार किया कि कोचिंग मदद कर सकती है, लेकिन चयन की गारंटी नहीं।
उनका फोकस रहा:
- सीमित किताबें
- एक ही स्रोत से बार-बार पढ़ाई
- बार-बार रणनीति बदलने से बचना
उनका मानना था कि 90% कंटेंट हर किताब में समान होता है, फर्क केवल भाषा और प्रस्तुति का होता है। बार-बार किताब बदलने से दिमाग भ्रमित होता है।
खुद की गलतियों को पहचानना ही असली तैयारी
मोना की तैयारी का सबसे मजबूत आधार था—self-analysis।
वे मानती हैं कि MPPSC परीक्षा का सार एक ही लाइन में है:
“अपनी गलतियों को पहचानो और उनमें सुधार करो।”
उन्होंने खुद स्वीकार किया:
- जहां कंटेंट की कमी थी, वहां और पढ़ाई की
- जहां स्पीड ठीक थी, वहां लिखने की चिंता नहीं की
- जहां फॉर्मेटिंग कमजोर थी, वहां टॉपर्स की कॉपी देखकर सीखा
यही कारण रहा कि दूसरे इंटरव्यू में उनके अंक 82 से बढ़कर 140 तक पहुंचे।
प्रीलिम्स: क्या पढ़ना है से ज्यादा जरूरी क्या नहीं पढ़ना
प्रीलिम्स को लेकर मोना की सोच बेहद व्यावहारिक थी। उनका मानना है कि प्रीलिम्स उसी का निकलता है जिसे यह स्पष्ट हो कि क्या छोड़ना है।
उन्होंने:
- पिछले 5 वर्षों के प्रश्नपत्रों का गहराई से विश्लेषण किया
- कम वेटेज लेकिन लंबे टॉपिक्स पर समय सीमित रखा
- छोटे लेकिन हाई-वेटेज टॉपिक्स पर फोकस बढ़ाया
MCQ और PYQ को उन्होंने सिर्फ अभ्यास नहीं, बल्कि गलती पकड़ने का टूल माना।
मेंस और इंटरव्यू: डर नहीं, समझ जरूरी
मोना का मानना है कि मेंस “लिखने की वजह से” कठिन नहीं होता। हम जीवन भर परीक्षाएं लिखते आए हैं। असली चुनौती होती है:
- कंटेंट की स्पष्टता
- सिलेबस से बाहर न जाना
- ईमानदारी से जवाब देना
इंटरव्यू में उन्होंने यह सीखा कि हर प्रश्न का “सही” उत्तर नहीं होता, लेकिन हर उत्तर के पीछे तर्क और ईमानदारी होनी चाहिए।
सबसे बड़ा उद्देश्य: चयन से आगे की सोच
मोना की तैयारी का उद्देश्य केवल पद नहीं था। उनका “why” बहुत स्पष्ट था—अपने जैसे गांवों की लड़कियों के लिए रास्ता खोलना।
चयन के बाद जब गांव में माता-पिता खुद अपनी बेटियों को पढ़ाने की बात करने लगे, तब उन्हें लगा कि उनकी मेहनत सार्थक हुई।
MPPSC aspirants के लिए 5 सीख
- कमियां खत्म नहीं होतीं, दिशा बदलने से ताकत बनती हैं
- बिना कोचिंग भी चयन संभव है, अगर self-study मजबूत हो
- सीमित स्रोत और बार-बार रिवीजन सबसे बड़ी कुंजी है
- हर टॉपर की रणनीति कॉपी नहीं की जा सकती
- चयन से बड़ा लक्ष्य होना जरूरी है, वही आपको टिकाए रखेगा
अंतिम बात
MPPSC कोई रहस्यमयी परीक्षा नहीं है। यह उन्हीं लोगों द्वारा निकाली जाती है, जो कभी खुद भी भ्रम, डर और सीमाओं में फंसे होते हैं।
मोना दांगी की कहानी इस बात का प्रमाण है कि सही सोच, आत्म-विश्लेषण और निरंतर प्रयास से परिस्थितियां बदली जा सकती हैं।
अगर आप आज खुद को कमजोर मानते हैं, तो यह कहानी आपके लिए है।
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